🌺 ॐ क्रीं कालिकायै नमः 🌺

माँ काली — आदिशक्ति, साहस और संरक्षण

माँ काली का परिचय, महाकाली स्तुति, श्रीकालिकाष्टकम् और काली गायत्री मंत्र — हिन्दी एवं देवनागरी में

माँ महाकाली का दिव्य स्वरूपमाँ काली की एआई द्वारा निर्मित भक्तिमय कलाकृति, स्वर्णिम प्रभामंडल और दीपों के साथ
॥ ॐ क्रीं कालिकायै नमः ॥ माँ काली का एआई-निर्मित कलात्मक चित्रण
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माँ काली का परिचय

माँ काली हिन्दू शाक्त परंपरा में आदिशक्ति का उग्र, करुणामय और रक्षक स्वरूप मानी जाती हैं। उनका नाम ‘काल’ से जुड़ा है; वे समय, परिवर्तन और अहंकार के अतिक्रमण का प्रतीक हैं।

देवी की प्रतिमा में प्रायः गहरा वर्ण, मुक्त केश, मुण्डमाला, खड्ग और अभय मुद्रा दिखाई जाती है। भक्त इन प्रतीकों में अज्ञान के नाश, निर्भयता और मुक्ति का संदेश देखते हैं।

पश्चिम बंगाल की काली पूजा और देशभर के अनेक शक्तिपीठों में उनकी विशेष आराधना की जाती है। दक्षिणा काली, महाकाली और भद्रकाली जैसे स्वरूपों की उपासना की अपनी-अपनी परंपराएँ हैं।

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श्री काली स्तोत्रम् — चयनित स्तुति

माँ काली के नामों और रक्षक स्वरूप की प्रसिद्ध स्तुति। नीचे चयनित श्लोक दिए गए हैं; इसे किसी लंबे स्तोत्र का सम्पूर्ण पाठ न समझें।

॥ श्री महाकाली स्तुति — चयनित पारंपरिक श्लोक ॥

ॐ जयन्ती मङ्गला काली भद्रकाली कपालिनी ।
दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तु ते ॥

कालि कालि महाकालि कालिके परमेश्वरि ।
सर्वदेवि नमस्तुभ्यं नरकार्णवतारिणि ॥

॥ ॐ क्रीं कालिकायै नमः ॥
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श्री कालिकाष्टकम् — सम्पूर्ण पाठ

परंपरागत रूप से शंकराचार्य से संबद्ध पाठ। इसमें तीन ध्यान-श्लोक, आठ स्तुति-श्लोक (आठवाँ फलश्रुति) हैं।

॥ श्रीकालिकाष्टकम् ॥

॥ ध्यानम् ॥
गलद्रक्तमुण्डावलीकण्ठमाला
महोघोररावा सुदंष्ट्रा कराला ।
विवस्त्रा श्मशानालया मुक्तकेशी
महाकालकामाकुला कालिकेयम् ॥ १॥

भुजेवामयुग्मे शिरोऽसिं दधाना
वरं दक्षयुग्मेऽभयं वै तथैव ।
सुमध्याऽपि तुङ्गस्तना भारनम्रा
लसद्रक्तसृक्कद्वया सुस्मितास्या ॥ २॥

शवद्वन्द्वकर्णावतंसा सुकेशी
लसत्प्रेतपाणिं प्रयुक्तैककाञ्ची ।
शवाकारमञ्चाधिरूढा शिवाभिश्-
चतुर्दिक्षुशब्दायमानाऽभिरेजे ॥ ३॥

॥ अथ स्तुतिः ॥
विरञ्च्यादिदेवास्त्रयस्ते गुणास्त्रीन्
समाराध्य कालीं प्रधाना बभूबुः ।
अनादिं सुरादिं मखादिं भवादिं
स्वरूपं त्वदीयं न विन्दन्ति देवाः ॥ १॥

जगन्मोहिनीयं तु वाग्वादिनीयं
सुहृत्पोषिणीशत्रुसंहारणीयम् ।
वचस्तम्भनीयं किमुच्चाटनीयं
स्वरूपं त्वदीयं न विन्दन्ति देवाः ॥ २॥

इयं स्वर्गदात्री पुनः कल्पवल्ली
मनोजास्तु कामान् यथार्थं प्रकुर्यात् ।
तथा ते कृतार्था भवन्तीति नित्यं
स्वरूपं त्वदीयं न विन्दन्ति देवाः ॥ ३॥

सुरापानमत्ता सुभक्तानुरक्ता
लसत्पूतचित्ते सदाविर्भवत्ते ।
जपध्यानपूजासुधाधौतपङ्का
स्वरूपं त्वदीयं न विन्दन्ति देवाः ॥ ४॥

चिदानन्दकन्दं हसन् मन्दमन्दं
शरच्चन्द्रकोटिप्रभापुञ्जबिम्बम् ।
मुनीनां कवीनां हृदि द्योतयन्तं
स्वरूपं त्वदीयं न विन्दन्ति देवाः ॥ ५॥

महामेघकाली सुरक्तापि शुभ्रा
कदाचिद् विचित्राकृतिर्योगमाया ।
न बाला न वृद्धा न कामातुरापि
स्वरूपं त्वदीयं न विन्दन्ति देवाः ॥ ६॥

क्षमस्वापराधं महागुप्तभावं
मया लोकमध्ये प्रकाशिकृतं यत् ।
तव ध्यानपूतेन चापल्यभावात्
स्वरूपं त्वदीयं न विन्दन्ति देवाः ॥ ७॥

॥ फलश्रुतिः ॥
यदि ध्यानयुक्तं पठेद् यो मनुष्यस्-
तदा सर्वलोके विशालो भवेच्च ।
गृहे चाष्टसिद्धिर्मृते चापि मुक्तिः
स्वरूपं त्वदीयं न विन्दन्ति देवाः ॥ ८॥

॥ इति श्रीकालिकाष्टकं सम्पूर्णम् ॥
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श्री काली गायत्री मंत्र

माँ कालिका के ध्यान के लिए प्रचलित गायत्री मंत्र का एक पाठ-रूप तथा सरल नाम-जप। विभिन्न परंपराओं में मंत्र के पाठभेद मिलते हैं।

॥ श्री काली गायत्री मंत्र ॥

ॐ कालिकायै विद्महे
श्मशानवासिन्यै धीमहि ।
तन्नोऽघोरा प्रचोदयात् ॥

॥ सरल नाम-जप ॥
ॐ क्रीं कालिकायै नमः ॥

मंत्र का भावार्थ: हम माँ कालिका के स्वरूप का ध्यान करें; वे हमारी चेतना को प्रेरणा दें। विशेष तांत्रिक साधना के लिए परंपरा के योग्य गुरु का मार्गदर्शन लें।