नवनारायण अवतार
द्रुमिल नारायण
गुरु
श्री दत्तात्रेय
जन्म कैसे, कब और कहाँ हुआ?
🔱 श्री भर्तृहरिनाथ महाराज की दिव्य जन्मकथा
श्री भर्तृहरिनाथ महाराज, जिन्हें राजा भर्तृहरि
और भरथरीनाथ के नाम से भी जाना जाता है,
श्री नवनाथ भक्तिसार की धार्मिक कथा-परंपरा
में द्रुमिल नारायण का अवतार माने जाते हैं।
उनका जन्मवृत्तांत अत्यंत अद्भुत और अलौकिक
बताया गया है। धार्मिक मान्यता के अनुसार,
उनका प्राकट्य किसी साधारण माता के गर्भ
से नहीं, बल्कि सूर्यबीज और कौलिक ऋषि
के भिक्षापात्र से संबंधित एक दिव्य
घटना के माध्यम से हुआ था।
नवनाथ परंपरा के अनुसार, नौ नारायणों
ने पृथ्वी पर अवतार धारण करके
योगविद्या, आत्मज्ञान, वैराग्य
और गुरु-भक्ति का संदेश फैलाने
का संकल्प लिया था।
इन्हीं नवनारायणों में
द्रुमिल नारायण का अवतरण
भर्तृहरिनाथ महाराज के
रूप में माना जाता है।
उनकी जन्मकथा का संबंध
भगवान सूर्य के दिव्य तेज
और कौलिक ऋषि के
भिक्षापात्र से बताया जाता है।
कथा में सूर्यबीज के
एक विशेष पात्र में
पहुँचने और उसी के
माध्यम से एक दिव्य
जीव के प्राकट्य
का वर्णन मिलता है।
धार्मिक कथा के अनुसार,
कौलिक ऋषि तपस्वी
और साधनारत महात्मा थे।
उनके पास एक भिक्षापात्र
था, जिसका उपयोग वे
अपनी दैनिक आवश्यकताओं
के लिए करते थे।
इसी पात्र से जुड़ी
एक असाधारण घटना
आगे चलकर भर्तृहरिनाथ
महाराज के जन्म
का कारण बनी।
नवनाथ भक्तिसार की
कथा-परंपरा में वर्णन
आता है कि सूर्यबीज
का संचार कौलिक ऋषि
के भिक्षापात्र में हुआ।
यह बीज साधारण
नहीं माना गया,
क्योंकि इसके
माध्यम से
द्रुमिल नारायण
का पृथ्वी पर
अवतरण होना था।
समय आने पर
उस भिक्षापात्र
से एक दिव्य
बालक का
प्राकट्य हुआ।
इस घटना को
नाथ परंपरा
में ईश्वरीय
संकल्प और
सूर्य के
दिव्य तेज
से संबंधित
माना जाता है।
वही दिव्य बालक
आगे चलकर
भर्तृहरि के
नाम से
प्रसिद्ध हुआ।
उनकी जन्मकथा
यह दर्शाती है
कि नवनारायणों
का प्राकट्य
धार्मिक
मान्यताओं
के अनुसार
अनेक अद्भुत
माध्यमों
से हुआ था।
भर्तृहरिनाथ
महाराज की
जीवनकथा का
अगला महत्वपूर्ण
भाग उनके
राजसी जीवन
से संबंधित है।
नाथ संप्रदाय
की प्रचलित
कथाओं में
उन्हें
उज्जयिनी
अर्थात
वर्तमान
उज्जैन
का राजा
बताया जाता है।
राजा भर्तृहरि
को राजा
विक्रमादित्य
का भाई
माना जाता है,
ऐसी एक
प्रसिद्ध
लोकपरंपरा है।
इन कथाओं
में उनका
जीवन
राजसत्ता,
सांसारिक
वैभव,
प्रेम,
मोहभंग
और अंततः
वैराग्य
से जुड़ा
हुआ मिलता है।
राजा भर्तृहरि
के पास
धन-दौलत,
राजमहल,
सेवक,
सम्मान
और अनेक
सांसारिक
सुख-सुविधाएँ
थीं।
किंतु
धार्मिक
कथाओं के
अनुसार,
इन सबके
बीच भी
उनके जीवन
में एक
ऐसा समय
आया जब
उन्हें
संसार की
नश्वरता
का गहरा
अनुभव हुआ।
भर्तृहरि
की प्रसिद्ध
लोककथा
में एक
अमरफल
का प्रसंग
मिलता है।
कथा के
अनुसार,
एक तपस्वी
ने राजा
को ऐसा
फल प्रदान
किया,
जिसे खाने
वाले को
दीर्घजीवन
अथवा अमरत्व
प्राप्त
होने की
मान्यता थी।
राजा ने
अपनी प्रिय
रानी के
प्रति
प्रेम के
कारण वह
फल उसे
दे दिया।
किंतु
लोककथा
के अनुसार,
वह फल
अलग-अलग
व्यक्तियों
के हाथों
से होकर
अंततः
पुनः राजा
के पास
पहुँच गया।
इस घटना से
राजा भर्तृहरि
को सांसारिक
प्रेम,
मोह और
संबंधों
की अस्थिरता
का गहरा
अनुभव हुआ।
उनके मन
में वैराग्य
की भावना
जागृत होने
लगी।
उन्हें
यह विचार
सताने लगा
कि यदि
राजवैभव
और सांसारिक
सुख भी
स्थायी
नहीं हैं,
तो जीवन
का वास्तविक
उद्देश्य
क्या है?
यह प्रसंग
राजा भर्तृहरि
के जीवन
में एक
महत्वपूर्ण
परिवर्तन
का प्रतीक
माना जाता है।
उनका मन
धीरे-धीरे
राजसुख
से हटकर
आत्मज्ञान,
योगसाधना
और मोक्ष
की खोज
की ओर
अग्रसर हुआ।
नाथ संप्रदाय
की धार्मिक
परंपरा में
श्री गोरखनाथ
महाराज को
भर्तृहरिनाथ
महाराज का
गुरु माना
जाता है।
गोरखनाथ
महाराज के
मार्गदर्शन
में भर्तृहरि
ने सांसारिक
मोह का
त्याग करके
योगमार्ग
अपनाया,
ऐसी मान्यता है।
गुरु गोरखनाथ
महाराज ने
उन्हें
वैराग्य,
गुरु-भक्ति,
योगविद्या
और आत्मज्ञान
का महत्व
समझाया।
धार्मिक
कथाओं में
भर्तृहरि
के राजसी
जीवन से
योगी जीवन
की ओर
परिवर्तन
को अत्यंत
महत्वपूर्ण
माना जाता है।
आगे चलकर
राजा भर्तृहरि
ने राजपाट
और सांसारिक
वैभव का
त्याग किया
तथा नाथ
संप्रदाय
की योगी
परंपरा
को स्वीकार
किया।
वे तपस्या,
ध्यान और
आध्यात्मिक
साधना
में लीन
हो गए।
इसी आध्यात्मिक
परिवर्तन के
कारण राजा
भर्तृहरि
आगे चलकर
श्री भर्तृहरिनाथ
महाराज के
रूप में
पूजनीय हुए।
नाथ संप्रदाय
में उन्हें
नौ महान
सिद्धयोगियों
में स्थान
दिया जाता है।
भारतीय
साहित्यिक
परंपरा में
भर्तृहरि
नाम से
नीति,
शृंगार
और वैराग्य
विषयक
प्रसिद्ध
शतकों का
संबंध भी
मिलता है।
विशेष रूप
से वैराग्य
शतक में
संसार की
नश्वरता
और त्याग
का गहन
चिंतन
दिखाई देता है।
हालाँकि,
साहित्यिक
भर्तृहरि,
लोककथाओं
के राजा
भर्तृहरि
और नाथ
संप्रदाय
के भर्तृहरिनाथ
की ऐतिहासिक
पहचान को
लेकर विद्वानों
में मतभेद हैं।
इसलिए इन
सभी परंपराओं
को बिना
भेद किए
एक ही
ऐतिहासिक
जीवनवृत्त
नहीं मानना
चाहिए।
श्री भर्तृहरिनाथ
महाराज की
जन्मकथा और
जीवन का
आध्यात्मिक संदेश
यह है कि
मनुष्य के
पास कितना
भी धन,
सम्मान,
अधिकार
और वैभव
क्यों न हो,
आत्मज्ञान
के बिना
जीवन की
परम शांति
प्राप्त
नहीं होती,
ऐसी शिक्षा
नाथ परंपरा
में दी
जाती है।
भिक्षापात्र
से प्राकट्य
की कथा
और राजा
से योगी
बनने की
परंपरा
दोनों मिलकर
यह संदेश
देती हैं
कि जीवन
की महानता
बाहरी
परिस्थितियों
में नहीं,
बल्कि
आत्मज्ञान,
वैराग्य
और गुरु
के प्रति
समर्पण
में निहित है।
जन्मस्थान और जन्मकाल
के विषय में:
श्री नवनाथ
भक्तिसार की
धार्मिक
कथा-परंपरा
में भर्तृहरिनाथ
महाराज का
प्राकट्य
कौलिक ऋषि
के भिक्षापात्र
में सूर्यबीज
के संचार
से संबंधित
बताया जाता है।
उनके जीवन
की बाद की
कथाएँ
उज्जयिनी
के राजपरिवार
से जुड़ी हैं।
किंतु उनकी
निश्चित
ऐतिहासिक
जन्मतिथि
और जन्मस्थान
प्रमाणित
नहीं हैं।
इसलिए
दिव्य जन्मकथा
और ऐतिहासिक
तथ्यों के
बीच अंतर
समझना आवश्यक है।
॥ ॐ नमो आदेश ।
जय श्री भर्तृहरिनाथ महाराज ॥
स्थान और समय:
भिक्षापात्र से प्राकट्य की कथा; राजकीय इतिहास और जन्मतिथि विवादित। कथाएँ कलियुग में अवतरण का उल्लेख करती हैं, पर विश्वसनीय ईस्वी जन्म-वर्ष उपलब्ध नहीं।
गुरु और शिष्य
गुरु:
श्री दत्तात्रेय।
शिष्य / परंपरा:
कथाओं में गोपीचंद और अन्य साधकों से संबंध; निश्चित गुरु-शिष्य सूची नहीं।
विशेषता
राजवैभव का त्याग, वैराग्य, योगसाधना।
समाधि / प्रमुख तीर्थ
उज्जैन सहित कई स्थलों पर भर्तृहरि गुफा/तपस्थल मान्य हैं; निश्चित समाधि पर मतभेद।